- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
1.
बिन तुम्हारे जिया नहीं जाता
युग बीते हम क्यों नहिं बीते
1.
किसने मचलाया है मुझको ?
किसने
मचलाया है मुझको ?
किसमें
मैंने देखी निज छवि
और
पकड़ने लपक गया था
किन्तु
न थी सच्चाई जिसमें
झूठमूठ
मैं बहक गया था
मन में
ज्योतिर्भाव उगाकर
किसने
उकसाया है मुझको ?
बहा जा
रहा था मैं अविरत
किसने
रोका लंगर बनकर ?
बहने
लगी निराली धारा
किसके
झरने से छन छनकर ?
बुला
दृगों से सदा दृगों में
किसने
उलझाया है मुझको ?
कौन
अचानक दमकी बन
दामिनि
मेरे जीवन घन में
किसे
देखने की इच्छा
सर्वदा
बनी रहती मन में
किसने
छीन खुशी के सपने
रह-रह
तरसाया है मुझको ?
किसने
भंग शांति की मेरी
घुली–मिली ध्यान से हमारे
चुरा
लिया अगणित भावों को
नहीं
कभी भी तनिक बिचारे
नजरों
को टकरा टकराकर
किसने
पिघलाया है मुझको ?
2.
बिन तुम्हारे जिया नहीं जाता
मुझसे
अब तो सहा नहीं जाता
दर्द
दिल का कहा नहीं जाता
किस तरह
खुद को तसल्ली दूँ मैं
बिन
तुम्हारे जिया नहीं जाता
कोई तो
जाके उन्हें समझाए
ऐसे
जीवन जिया नहीं जाता
बेध जो
जाए जुबाँ अनजाने
बख्शना
मुह सिया नहीं जाता
दर्द
होठों पे उतर आते हैं
आँख से
अब पिया नहीं जाता
इतना
बेबस हमें बनाया क्यों
अब तो
तनहा रहा नहीं जाता
लेखनी
यूँ ही बहकती है विमल
मुझसे
संयम किया नहीं जाता
3.
मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ
महीनों
पूर्व
एक
सिहरन हुई थी मन में
रोम–रोम डूब चुका था मधु की मादकता में
तब पता
नहीं था क्या है यह
कल जब
यूँ ही दर्द से परेशान हो उठा
तो
महसूस किया
एक
खूबसूरत पौधा
जो मेरे
प्राण का अंग बन गया था
वज्रपात
की कल्पना से कुम्हला गया था
और आज
वह सच
जान चुका हूँ
बताऊँ ?
मैं
तुझे बहुत प्यार करता हूँ ।
4.
युग बीते हम क्यों नहिं बीते
ग्रीष्म
के आगोश में
छतनार
द्रुम की मधुर छाया
बही
हल्की पवन
हिलने
लगे पत्ते
काँपते
हों होंठ जैसे
प्यार
की पहली छुअन पर
लगा
तिरने नजर में
ज्यों
उदधि चंचल बना हो
मुस्कराते
होठ
मन को
गुदगुदी देने लगे
तोड़
अनुशासन लगे ढँकने बिखरते केश
चंदा को
निगाहों से समाते जा रहे
उर के
सुनहरे गाँव में
बेतहाशा
किंतु धीरज साथ रखकर
देखता
ही जा रहा हूँ
पी रहा
हूँ
हाँ पिए
ही जा रहा हूँ …. …. …
युग बीते हम क्यों नहिं बीते ?
युग बीते हम क्यों नहिं बीते ?
साभार- जागरण जंक्शन
डॉट कॉम
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