Tuesday, August 23, 2016

सर्जना प्यार का मृगछौना है,पाल लो

- रामरक्षा मिश्र विमल


रात के अँधियारे में
सन्नाटा जब शोर करने लगता है
स्पंदन शून्यता की ओर बढ़ जाता है
तब अचानक प्रकट होती है सर्जना
और चुपके से कह जाती है कानों में कुछ
फिर तो वायरस से भरी जिंदगी
स्वतः फार्मेट हो जाती है
और फागुन व सावन के
क्लियर पिक्चर डिस्प्ले होने लगते हैं
पतझड़ और वसंत की संवेदना पर
कनखी से मुस्कराते नैन शरमा जाते हैं अब
और हम कंफिडेंस के साथ
कह सकने की स्थिति में होते हैं
कि यह आदमी है और यह मशीन ।
जब सामने का हर आदमी अधूरा लगने लगता है
मन संकल्प विकल्पों में
उलझता खीझता रहता है
जीवन डोर पर से पकड़ ढीली पड़ने लगती है
तब नवीन चेतना से भर देती है सर्जना ।

सर्जना
समझाती है
फूलों की भाषा
समुद्र की हलचल
नदी की काँपती नाचती उछलती
और गिरती पड़ती लहरों की धुन
मधुलुब्ध भौंरों की गुनगुन
पहाड़ों का चिंतित मन
और बूढ़े बरगद का
शांत और गंभीर वदन ।

सर्जना पतंग की डोर है , छोड़ो मत
सर्जना नसीब का आईना है , तोड़ो मत
सर्जना नाव की पतवार है , सँभाल लो

सर्जना प्यार का मृगछौना है , पाल लो ।
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Monday, December 28, 2015

बिहार गीत

जय जय हे बिहार


- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल


नित आलोकित जन मन जय जय हे बिहार |
सबको करे प्रफुल्लित जय जय हे बिहार |
 
नालंदा चाणक्य तथागत महावीर
गंडक फल्गू सोन कौशिकी के सुनीर
दिव्य बोध गौरव के भरते सद्विचार |
 
विद्यापति राजेंद्र भिखारी ठाकुर स्वर
तप से विश्वामित्र करें मन प्राण अमर
तन मन चंगा,गंगा हरती सब विकार |
 
सद्भावना परिश्रम न्याय बने संबल
प्रगति धार में नर नारी सम और सबल
सबमें सबके लिए प्रेम की मृदुल धार |
(जनवरी, 2011)




Sunday, September 7, 2014

हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर

- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल







हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए सर्व प्रकार से स्वातंत्र्य-उपार्जन है । हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं । हमारा लक्ष्य है कि हम अपने देश के गौरव को बढ़ावें , अपने देशवासियों में स्वाभिमान संचार करें , उनको ऐसा बनावें कि भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो , संकोच न हो | यह अभिमान स्वतंत्रता देवी की उपासना करने से मिलता है ।" दैनिक आजके प्रवेशांक ( 5 सितंबर,1920 ) की इस संपादकीय टिप्पणी के लेखक थे पं बाबूराव विष्णु पराड़कर , जिनकी पत्रकारिता ने राष्ट्रीय जागरण,स्वाधीनता संग्राम तथा स्वातंत्र्योत्तर भारत के नव निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका दी है ।

यद्यपि,भारतीय स्वतंत्रता का श्रेय महात्मा गांधी को जाता है,तथापि पं पराड़कर जैसे स्वतंत्रतापूर्व के पत्रकार उन नींव के पत्थरों में से हैं , जिन्होंने अपने अस्तित्व को मिटाकर स्वतंत्रता का विशाल भवन खड़ा किया था । अपेक्षाकृत साधनहीन होते हुए भी इनकी पत्रकारिता ने देश की स्वतंत्रता का जो संकल्प लिया था उससे रंचमात्र भी अलग न हो सकी । इसी पवित्र ध्येय के लिए तो हिंदी पत्रकार जिए और मरे ।

पं बनारसीदास चतुर्वेदी लिखते हैं कि पूरे पचास वर्ष तक पत्र जगत की निरंतर सेवा करनेवाले किसी दूसरे हिंदी पत्रकार का हमें पता नहीं,और इस विषय में पराड़कर जी निस्संदेह अद्वितीय थे ।1 किंतु,पराड़कर जी की यह पत्रकारिता उनका उद्देश्य न थी,उनका मुख्य उद्देश्य था-क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होकर देश सेवा करना । हिंदी बंगवासी में सहायक संपादक का कार्य स्वीकारने के पीछे अपने परिवार का खर्च चलाना और पुलिस की नजरों से बचना ही प्रधान था । वे हितवार्ताऔर भारतमित्रके संपादन के साथ-साथ चंदन नगर स्थित क्रांतिकारी दल की गुप्त समिति का काम भी करते थे ।

पत्रकारिता के प्रेरणा स्रोत

हिंदी पत्रकारिता के इस भीष्म पितामह के प्रेरणा स्रोत थे उनके मामा बंगला भाषा के प्रख्यात लेखक सखाराम गणेश देउस्कर । उन्होंने ही पराड़कर जी का राजनीतिक संस्कार किया । मामाजी द्वारा बाल्यकाल में ही बोए गए संस्कारों के बीज तब अनुकूल वातावरण पाकर लहलहाती समृद्ध फसल बन गए,जब आगे चलकर उन्हें लोकमान्य तिलक और योगी अरविंद घोष जैसे महान नेताओं का संपर्क एवं उनके दर्शन के स्वाध्याय का अवसर मिला ।

पत्रकार जीवन

पराड़कर जी का पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण सन् 1906 में हिंदी बंगवासी में सहायक संपादक के रूप में हुआ था किंतु उसमें आत्मसंतोष न होने के कारण उन्होंने महान क्रांतिकारी योगी अरविंद घोष के नेशनल कालेज में हिंदी और मराठी का अध्यापन भी शुरू कर दिया । बंगवासी के प्रबंधक को यह बात जँची नहीं और उसने ऐसा करने से मना किया किंतु बंगवासी के माध्यम से कांग्रेस की खिल्ली उड़ानेवाले और कटु आलोचना करनेवाले प्रबंध संपादक की बात यह उग्र राष्ट्रीय व्यक्तित्व भला कैसे सहन कर सकता था ? उन्होंने आत्महनन के मूल्य पर नौकरी करना उचित नहीं समझा और नौकरी छोड़ दी | सन् 1907 में उन्होंने हितवार्ता का संपादक पद सँभाला । यह पत्र उनके अनुकूल था क्योंकि इसमें उन्हें राजनीतिक विषयों पर गंभीर समीक्षात्मक लेख प्रस्तुत करने का मौका मिलता था ।

हितवार्ता में रहने के दौरान पराड़कर जी ने नेशनल कालेज का अध्यापन कार्य नहीं छोड़ा,बल्कि उसमें उन्होंने हिंदी अध्यापन के लिए पं अंबिका प्रसाद वाजपेयी को भी बुला लिया था,किंतु जब नेशनल कालेज भी गवर्नमेंट के प्रभाव क्षेत्र में आ गया तो अंततः उन्हें कालेज छोड़ना ही पड़ा । पराड़कर जी के जीवनी लेखक लक्ष्मीशंकर व्यास लिखते हैं कि महर्षि अरविंद घोष का नेशनल कालेज एक प्रकार से तत्कालीन क्रांतिकारियों का एक प्रधान केंद्र बन गया था । पराड़कर जी इस कालेज में हिंदी-मराठी का अध्यापन-कार्य करते थे साथ ही यहाँ उनका क्रांतिदलवालों से भी संपर्क होता था । अध्यापन के समय पराड़कर जी छात्रों को फ्रांस और रूसी क्रांति का इतिहास बताते हुए इस बात पर बल देते थे कि देश के युवकों पर भारतमाता की स्वतंत्रत का भारी उत्तरदायित्व है । हमारा देश परतंत्र है,इसे स्वतंत्र करना चाहिए ।

सन् 1910 में हितवार्ता के प्रकाशन के बंद होने के बाद पराड़कर जी ने भारतमित्र में पं अंबिका प्रसाद वाजपेयी के साथ काम करना शुरू कर दिया । इन दोनों तपस्वियों ने मिलकर भारतमित्र के स्तर को बहुत उन्नत किया था । प्रतिदिन यह पत्र 4000 की संख्या में छपता था । दुर्भाग्यवश उन्ही दिनों कोलकाता के तत्कालीन डिप्टी पुलिस सुपरिंटेंडेंट की हत्या हो गई और 1 जुलाई 1916 को क्रांतिकारी दल में कार्य करने के अपराध में उन्हें साढ़े तीन वर्ष का कारावास हो गया | किन्तु ,प्रमाण के अभाव में जनता के भावी प्रतिकार की आशंका से मजबूर होकर अंग्रेज सरकार ने 1920 में उन्हें जेल से मुक्त कर दिया । भारतमित्र के तत्कालीन संपादक पं. लक्ष्मण नारायण गर्दे ने उनसे भारतमित्र के संपादन हेतु अनुरोध किया किंतु पराड़कर जी ने स्वीकार नहीं किया और काशी चले गए ।

काशी में उन दिनों हिंदी साहित्य की अभिवृद्धि के लिए बाबू शिवराम प्रसाद गुप्त ने ज्ञानमंडल की स्थापना की थी । उन्होंने पराड़कर जी से अपने प्रकाशन से एक दैनिक पत्र का संपादन- भार उठाने के लिये आग्रह किया और उस आग्रह पर पराड़कर जी ने पुन: अपने पत्रकार रूप को ग्रहण किया । इस प्रकार काशीसे इनके संपादन में आजनिकला और बीच में कई बार आजसे संबंध टूटते रहने के बावजूद इनके पत्रकार- जीवन का अधिक समय आजमें ही बीता । इनके क्रांतिकारी काल की उपलब्धियों में से इनके द्वारा संसारका संपादन और रणभेरीका प्रकाशन भी है । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उनकी लेखनी सामाजिक पुनर्जागरण में सार्थक भूमिका निबाहती रही ।

सम्मान और पुरस्कार

पराड़कर जी सन् 1925 में वृंदावन साहित्य सम्मेलन के अवसर पर आयोजित प्रथम संपादक सम्मेलन के सभापति बनाये गये थे । इस अवसर पर उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के अतीत और वर्तमान पर ही नहीं , उसके भविष्य की रूपरेखा भी एक युगद्रष्टा की भाँति प्रस्तुत की थी । सन् 1938 में आज हिंदी- साहित्य सम्मेलन के सत्ताईसवें अधिवेशन के सभापति चुने गए थे । सन् 1953 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा ने इन्हें हिंदी सेवा के लिये 1501 रु. का महात्मा गांधी पुरस्कारदिया था ।

हिंदी की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा

पराड़कर जी के हिन्दी प्रेम के बारे में कृष्णबिहारी मिश्र 3 लिखते हैं कि हिंदी के पुराने पंडितों से इनका संबंध था । इतना ही नहीं , हिंदी के अनेक श्रेष्ठ लेखकों के निर्माण में पराड़कर जी का योग रहा है | हिंदी के सभी पुराने-नए श्रेष्ठ लेखक पराड़कर जी का सम्मान करते थे | पराड़कर जी केवल हिंदी के पत्रकार ही नहीं थे,बल्कि अहिंदीभाषी परिवार में जन्म ले उन्होंने हिंदी को जो समर्थन दिया तथा हिंदी भाषा और साहित्य को अपनी अनवरत साधना द्वारा जो समृद्धि दी,उसके लिए हिंदी संसार पर उनका अशेष ऋण है | चूँकि उनका कई देशी भाषाओं पर अधिकार था इसलिए हिंदी का वे अधिक उपकार कर सके ।

हिंदी की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का पक्ष समर्थन करते हुए पराड़कर जी ने लिखा था कि यह सारे देश की भाषा है । इसमें प्रांतीय अभिमान बिल्कुल नहीं है,जो बात अन्य भाषाओं के संबंध में नहीं कही जा सकती । यही नहीं हिंदी में प्रांतीय अभाव के साथ-साथ इसमें अन्य प्रांतों के संबंध में अवज्ञासूचक कोई शब्द भी नहीं है,यह भी इसकी राष्ट्रीयता का एक प्रमाण है । इसके लेखकों का लक्ष्य हिंद होता है,कोई प्रांत विशेष नहीं | हिंदी राष्ट्र के लिए राष्ट्र के मुँह से बोलती है क्योंकि वह राष्ट्र की भाषा है ।

लोकप्रिय अग्रलेख

चरखे का संदेशा,समस्या और समाधान,महात्मा गाँधी की पुकार और क्रांतिकारियों की फाँसी आदि लेख पराड़कर जी के लोकप्रिय अग्रलेखों में से हैं । चरखे का संदेशामें पराड़कर जी ने चरखा,एकता और अछूतोद्धार का संदेश घर-घर पहुँचाने की अपील की है । उनका विश्वास है कि यदि हम अन्न और वस्त्र के मामले में स्वतंत्र हो जायँ तो कोई संदेह नहीं कि स्वराज्य हम हासिल कर लेंगे । महात्मा गांधी की पुकारमें महात्मा गाँधी के मार्मिक भाषणों का उदाहरण देते हुए उन्होंने भारत की जिंदादिली और गांधी जैसे नेता के नेतृत्व को ईश्वर की कृपा का परिचायक बतलाया है । क्रांतिकारियों की फाँसीमें जिस शैली में यथार्थ को सहज ढंग से पराड़कर जी ने प्रस्तुत किया है , उसे पढ़कर कलेजा टूक-टूक हो जाता है । निरंकुश अंग्रेजी साम्राज्य को निर्भीकता से चुनौती देने की क्षमता पराड़कर जी के संपादकीय लेखों में बराबर होती थी ।

29 अक्तूबर’1930 से 8 मार्च 1931 तक सरकारी नीति के विरोध में संपादकीय स्थल को खाली रखकर उस पर उनका केवल यह वाक्य होता था – “देश की दरिद्रता , विदेश जानेवाली लक्ष्मी , सिर पर बरसानेवाली लाठियाँ , देशभक्तों से भरनेवाले कारागारइन सबको देखकर प्रत्येक देशभक्त के हृदय में जो अहिंसामूलक विचार उत्पन्न हों,वही संपादकीय विचार है ।

संपादक और पत्रकारिता : ज्ञान सीमा और धर्म

संपादकों के लिए अपंक्षित न्यूनतम ज्ञान सीमा के संदर्भ में पराड़कर जी की मान्यता थी कि एक संपादक के लिए साहित्य,भाषा विज्ञान,समाजशास्त्र,राजनीतिशास्त्र तथा अंतर्राष्ट्रीय विधानों का सामान्य ज्ञान होना अनिवार्य है । उनके अनुसार किसी भी समाचार-पत्र के मुख्यतः दो धर्म होते हैं-एक तो समाज का चित्र खींचना और दूसरे सदुपदेश देना | इस दूसरे धर्म पर पराड़कर जी ज्यादा बल देते थे । उनकी यह मान्यता थी कि देश की सच्ची सेवा इसी शिक्षा धर्म के द्वारा की जा सकती है । यही कारण था कि वे अपने पत्रों में हमेशा ऊँचे चरित्रों एवं ऊँचे आदर्शों को स्थान दिया करते थे । आज की सर्वांगतः अपराध पत्रकारिता की कल्पना उन्होंने भविष्यद्रष्टा की भाँति पाँच दशक पूर्व ही कर ली थी और कहा था कि भ्रातृभाव से मैं आप सब संपादकों से प्रार्थना करता हूँ कि परमेश्वर ने आपको जो बड़ा पद दिया है उसका सदुपयोग कीजिए और समाज को सदा उन्नत करते रहना अपना धर्म समझिए ।

पराड़कर जी ने स्वतंत्रता संग्राम के एक उग्र क्रांतिकारी और एक सफल राष्ट्रीय पत्रकार के दायित्व का सफल निर्वहन किया है । आपने हिंदी पत्रकारिता को राष्ट्रीय जागरण का ही माध्यम नहीं बनाया है,वरन् भाषा और साहित्य के उत्थान में भी ऐतिहासिक भूमिका दी है । डा संपूर्णानंद ने इनकी हिंदी सेवा का मूल्यांकन करते हुए लिखा है कि दुःखमय कौटुंबिक जीवन,अच्छिद्र आर्थिक कष्ट,निरंतर राजनीतिक संघर्ष इन सबके बीच में रहते हुए पराड़कर जी ने हिंदी पत्रकारिता को जो अमूल्य निधि प्रदान की,उससे हिंदी जगत जल्दी उऋण नहीं हो सकता ।


साभार- प्रवासी दुनिया डॉट कॉम


हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर – डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल