- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
लगता नहीं
कि इस साल भी पूरा हो पाएगा
पत्नी से किया जा रहा
पिछले दस सालों से
एक नया शाल खरीदने का वादा
जब घर में
माँ की आँखों से गिरते हुए पानी और
उसकी आँख दिखाने की बात स्मृत होती है
तो अपना चश्मा बेमानी लगता है
घर परिवार के संबल का तर्क
मन को संतोष नहीं देता
यह आश्वासन निरर्थक होता है
कि अबकी जाड़ा में शहर ले चलूँगा और
जरूरत पड़ने पर आपरेशन भी करा दूँगा
क्योंकि मैं जानता हूँ
इसके न होने के पीछे कुछ ठोस कारण हैं और
उन्हें नकारना मेरे वश में नहीं
अपने मित्र के साथ एक दूकान में बैठकर
कलाकंद का एक पीस मुह में डालते ही
धूप में जला हुआ भाई का चेहरा
सामने आ जाता है और
तब वह कागज के टुकड़े की तरह
स्थिर हो जाता है और
बेमन से चबा जाता हूँ उसे
अर्थ है मगर अर्थहीन हूँ
रस बाँटता हूँ मगर रसहीन हूँ
शायद स्वाद का अनुभव
इतना अधिक हो चुका है कि
अब जिंदगी स्वादहीन हो गई है।
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लगता नहीं
कि इस साल भी पूरा हो पाएगा
पत्नी से किया जा रहा
पिछले दस सालों से
एक नया शाल खरीदने का वादा
जब घर में
माँ की आँखों से गिरते हुए पानी और
उसकी आँख दिखाने की बात स्मृत होती है
तो अपना चश्मा बेमानी लगता है
घर परिवार के संबल का तर्क
मन को संतोष नहीं देता
यह आश्वासन निरर्थक होता है
कि अबकी जाड़ा में शहर ले चलूँगा और
जरूरत पड़ने पर आपरेशन भी करा दूँगा
क्योंकि मैं जानता हूँ
इसके न होने के पीछे कुछ ठोस कारण हैं और
उन्हें नकारना मेरे वश में नहीं
अपने मित्र के साथ एक दूकान में बैठकर
कलाकंद का एक पीस मुह में डालते ही
धूप में जला हुआ भाई का चेहरा
सामने आ जाता है और
तब वह कागज के टुकड़े की तरह
स्थिर हो जाता है और
बेमन से चबा जाता हूँ उसे
अर्थ है मगर अर्थहीन हूँ
रस बाँटता हूँ मगर रसहीन हूँ
शायद स्वाद का अनुभव
इतना अधिक हो चुका है कि
अब जिंदगी स्वादहीन हो गई है।
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