- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
1
आँखों आँखों में छुपाए रखिए
उनको मन ही में बसाए रखिए
उनकी मासूमियत पर क्या गुस्सा
अपने ज़ज्बात बचाए रखिए
भूख अब लाइलाज लगती है
आबरू अपनी बचाए रखिए
पाक हैं मंदिर मस्जिद दोनों
खून से इनको बचाए रखिए
वे तो बेपर्द कभी होंगे ही
आप बस उँगली उठाए रखिए
क्या पता कब हो ज़रूरत अपनी
दिल में तूफान बिछाए रखिए
2
जो भी कुछ कल था वही आज नहीं
क्या हुआ आप खुशमिज़ाज नहीं
कान के पतले जरा रहम करो
हम तेरे भ्रम के हैं इलाज़ नहीं
वक्त उनका है सरेआम यहाँ
लूटने से जो आते बाज नहीं
अपने दामन में झाँक लेने का
अब तो शायद कोइर् रिवाज़ नहीं
धर्म के नाम बहे जाते हैं
खून पे आज भी क्यों नाज़ नहीं
वक्त का रुख ही पलट दे ऐसे
आज़ क्यों तेरे अल्फाज़ नहीं
_________________________
साभार- रचनाकार डॉट ऑर्ग
रामरक्षा मिश्र विमल की कुछ कविताएँ व ग़ज़लें
1
आँखों आँखों में छुपाए रखिए
उनको मन ही में बसाए रखिए
उनकी मासूमियत पर क्या गुस्सा
अपने ज़ज्बात बचाए रखिए
भूख अब लाइलाज लगती है
आबरू अपनी बचाए रखिए
पाक हैं मंदिर मस्जिद दोनों
खून से इनको बचाए रखिए
वे तो बेपर्द कभी होंगे ही
आप बस उँगली उठाए रखिए
क्या पता कब हो ज़रूरत अपनी
दिल में तूफान बिछाए रखिए
2
जो भी कुछ कल था वही आज नहीं
क्या हुआ आप खुशमिज़ाज नहीं
कान के पतले जरा रहम करो
हम तेरे भ्रम के हैं इलाज़ नहीं
वक्त उनका है सरेआम यहाँ
लूटने से जो आते बाज नहीं
अपने दामन में झाँक लेने का
अब तो शायद कोइर् रिवाज़ नहीं
धर्म के नाम बहे जाते हैं
खून पे आज भी क्यों नाज़ नहीं
वक्त का रुख ही पलट दे ऐसे
आज़ क्यों तेरे अल्फाज़ नहीं
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साभार- रचनाकार डॉट ऑर्ग
रामरक्षा मिश्र विमल की कुछ कविताएँ व ग़ज़लें
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