Sunday, September 7, 2014

माँ सरस्वती से निवेदन के तीन गीत



- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल


1
बरसा दे  रस आज  जरा  माँ।
जनम जनम की  प्यास सँजोए
सुख बारिश की  आस सँजोए
सूख गए से  जग मानस  की
शमित करा दे आज तृषा माँ।

भ्रम की दुनिया समझ सकें हम
पथ विकास पर कदम रखें हम
दिव्य ज्योति दे बोध करा शुभ
मग पर चलना दे सिखला माँ।

मिले शांति सब हों मति शीतल
हो  गंभीर  विमल  मन चंचल
सोए  जन  मानस  कुरेद  कर
एक बार फिर  दे न जगा माँ।

2

छमक उठी है पायल
धानी चुनरी की सिंगार
माँ कब वीणा के तारों पर
तेरा  सुर  लहराएगा ?

मस्त पवन के  झोंकों पर
तरुवर मदमाते झूम रहे
साँस साँस  संगीत  बसाए
मधुप सुमनदल चूम रहे

नई सुबह ले सूरज
करने आ पहुँचा मनुहार
माँ कब वीणा के तारों पर
तेरा  सुर  लहराएगा ?

फिर   जीने   की    चाह
समाती चली जा रही मन में अब
नई  उमंगों  की  धारा  में
प्राण  भला  क्यों  थथमें अब

शीत ताप की संधि
किए जा रही नव्य उजियार
माँ कब वीणा के तारों पर
तेरा  सुर  लहराएगा ?

3

कब होगा माँ  जीवन  मधुमय ?


पा सका न अब तक एक किरन
है तिमिर भरा  अब तक यह मन
दुख दर्दों के विलयन से  जीवन
बना रहा  अब  तक  विषमय ।

कब  विष का यह घट फूटेगा
कब   दुख  से  नाता  टूटेगा
कब  नीरव नभ में प्रमुदित मन
का होगा सरस सुखद अभिनय ?

नयनों का नीर  रुकेगा  कब ?
अंतर का गम सिमटेगा  कब ?
सुख और शांति का जननि बता
कब होगा मृदु मनहर परिणय ?

तुम   अपने  गीत  सुनाओगी
थपकी  दे  व्यथा  भुलाओगी
भारती बता अवसर ऐसा  पा
कब  होगा  जीवन  सुखमय ?

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साभार- जागरण जंक्शन डॉट कॉम

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