Sunday, September 7, 2014

दुष्यंत कुमार के साहित्यिक तेवर पर एक आलेख


ये रोशनी है हकीकत में एक छल लोगो

- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

हिन्दी के बहुचर्चित गजलकार दुष्यंत कुमार मध्यवर्गीय दुःख-दर्दों से अधिक जुड़े रहे हैं। प्रकाश की आशा लिए प्रतीक्षा के अभ्यासी लोगों को जब वे अंधकार को भुला-भुलाकर झाँकने का उपक्रम करते देखते हैं तो अचानक उनकी लेखनी के कान खड़े हो जाते हैं- क्या हुआ हमारे आजादी के सपनों का ? कहाँ चली गईं लाखों की कल्पनाओं में सजी देश की योजनाएँ ? आश्वासन की योजनाएँ विश्वास तक नहीं पहुँच पाईं |
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
और जब उनका शायर चिन्तन की गहराई में उतर जाता है तो उन्हें यह चिन्ता हो उठती है कि
तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है
तमाम उम्र नशे में निकल न जाय कहीं।
इसीलिए वे जनता को सचेत करते हैं-
ये रोशनी है हकीकत में एक छ्ल लोगो
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।


गजलकार दुष्यंत उन तथाकथित संभ्रांत व्यवितयों या पदाधिकारियों पर व्यंग्य करते हैं, जिनकी कमाई परिश्रम की तुलना में अधिक होती है और सेवा के नाम पर व्यवसाय-वृत्ति उनमें इतना घर कर गई है कि हर बार लाभ से उनके लोभ में बढ़ोतरी ही होती जाती है। इसी लोभ और अहंकार के फल के रूप में जो बेईमानी हमारे संस्कारों में बसती जा रही है, वही हमारे स्वार्थ को बढ़ावा देती है और दुष्यंत ऐसे लोगों को ही निशाना बनाकर अपना तीर छोड़ते हैं-
यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।


आजादी के बाद हमारे आंतरिक मूल्यों में इतनी गिरावट आयी है कि धोखेबाजी और समयानुकूल स्वार्थपूर्ति के लिए गिरगिट की तरह रंग बदलने से हम बाज नहीं आते। आज विश्वासघात चातुर्य का पर्याय बनता जा रहा है। गजलकार ने हमारी इस स्थिति का यों अकन किया है-
दुकानदार तो मेले में लुट गये यारो
तमाशबीन दुकानें लगाके बैठ गये।


देश की सांप्रतिक दुःस्थिति के पीछे प्रशासकों और सामाजिक ठेकेदारों की इसी भूमिका का अधिक हाथ है। जब रक्षकों की प्रकृति में भक्षक विलीन होकर एकाकार हो जाए तो पलायन की स्थिति तो आएगी ही | तभी तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले जीनेवाले दुष्यंत को भी यह छाँव अब सुहानी नहीं लगती, भयभीत करती है | यह विपरीत स्थिति खतरनाक है -
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए ।
और ऐसा हो भी क्यों नहीं, जबकि
अब नयी तहजीब के पेशे-नज़र हम
आदमी को भूनकर खाने लगे हैं ।
आदमी को भूनकर खाते-खाते हम इतना अभ्यस्त हो गए हैं कि भूखे पेट मरनेवालों पर विश्वास भी नहीं होता-
कई फाँके बिताकर मर गया जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा ।
अपने देश में एक ओर यदि बासी रोटियाँ कुत्ते भी नही खाते तो दूसरी ओर कई दिनो से सूखी रोटियों के प्रतीक्षित भी देखे जा सकते हैं-
हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत
तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठाकर फेंक दीं।

इन्ही सारी तकलीफों ने दुष्यंत की गजल में एक क्रांति का स्वर भर दिया और पत्थरों को भी पिघला देनेवाली आवाज की तलाश में निकल पड़े वे। परिवर्तन के लिये आवाज की मजबूरी को वे अनिवार्य मानते हैं-
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकरार हूँ आवाज में असर के लिए।
और, इसीलिए वे भयभीत और सहमे-से लोगों के हृदय में साहस भरते हैं-
पुराने पड़ गये डर फेंक दो तुम भी
ये कचरा आज बाहर फेंक दो तुम भी।
उनका स्वर सदा मनुष्यताविरोधी ताकतों के खिलाफ रहा-
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं |
गजलकार दुष्यंत इस घोषणा के माध्यम से कवियों के दायित्व की ओर इंगित करते हैं-
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।


संभवतः उनका यह विश्वास था कि उस लेखन की कोई उपयोगिता नहीं, जिसने अपने परिवेश के, समाज के दुःख-दर्द दूर करने में अहम भूमिका नहीं निभायी। वे तो सिर्फ इतने भर से स्वलेखन को सफल मान बैठते, जब उनके लेखन-प्रयास से किसी एक के हृदय में भी आग लग जाती और वह मशाल लेकर निकल पड़ता चतुर्दिक प्रकाश फैलाने हेतु | उनके इस प्रयास में उनका व्यष्टि रूप पूरी तरह समष्टि रूप में दिखाई पड़ता है-
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।
________________________________________________________________

साभार- जागरण जंक्शन डॉट कॉम
दुष्यंत कुमार के साहित्यिक तेवर पर एक आलेख




No comments:

Post a Comment