Sunday, September 7, 2014

बम धमाकों में प्रमुदिता खो रही है



- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
दीप शत शत जल उठे क्या
बम धमाकों में प्रमुदिता खो रही है
खो रही क्या सो रही है
तिमिरनाशक पर्व की व्याकुल दशा पर
कौन सा उपहार दूँ प्रिय मैं तुम्हे ?

 

जब हँसी में संकुचन रच बस रहा हो
अमियवर्षी बूँद हेतु तरस रहा हो
गिडगिडाते सूर्य की दयनीयता पर
कौन सा उपहार दूँ प्रिय मैं तुम्हें ?


ज्योति लोचन का नहीं वाणी विषय हो
संघ की जब हार ही अपनी विजय हो
हर कदम दम तोड़ती शुभ चेतना पर
कौन सा उपहार दूँ प्रिय मैं तुम्हें ?


अग्नि कोने में ठिठुरकर काँपती है
नींद सोती ही नहीं अब जागती है
आज बेबस बिलखती स्वाधीनता पर
कौन सा उपहार दूँ प्रिय मैं तुम्हें ?
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साभार- जागरण जंक्शन डॉट कॉम


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